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गुरुवार, 18 सितंबर 2025

गीता मलिक

1. मातृत्व

जैविक मातृत्व से भी बड़ा है
सृष्टि का मातृत्व
मेरे स्वप्न में आती है
वह गुलाम अफ्रीकी काली महिलाएँ
जो बेच दी गई कैरेबियाई द्वीपों अमेरिका और यूरोप के तमाम हिस्सों में
भर दी जाती थी पानी के जहाजों में इतने छोटे केबिनों में
जहाँ पैर फैलाने की जगह तक नहीं होती थी
लंबी यात्राओं में
मातृभूमि की स्मृति में
उन्हें याद रहता प्रतिपल
मोटे चावल का वही अफ्रीकी स्वाद
गुलाम औरतें जिन्हें जोत दिया गया यूरोपियन प्लांटेशन में
जहाँ विषम परिस्थितियों में भी उग आता था उनका धान
गुलाम औरतें संपत्ति के नाम पर मात्र स्मृति लेकर आई थी
पुरखों द्वारा अर्जित किए गए
पारंपरिक ज्ञान और अपनी स्मृति में रचे बसे
चावल के स्वाद को
उन्होंने हर जगह रोपा
जहाँ भी उन्हें रखा गया
 सृष्टि का मातृत्व कितना प्रबल था उनमें
जिसे बचाने के लिए
अफ्रीकी औरतें अपनी बेटियों के बालों में
गूँथ देती थी धान के बीज रात्रि में
इस भय से कि सुबह उन्हें बेच न दिया जाए
एक अजनबी मुल्क की मिट्टी में
और रसोई में
जिन्होंने फैला दी अपने स्वाद की खुशबू
और भर दिए उनकी संततियों के घर भंडार!

2. बूढ़ा नीम

कोई पहर है रात का
शायद तीसरा
घड़ी की टिक-टिक
एक पचपन
एक छप्पन…
निर्जन समय की चीत्कार
पानी की टिप-टिप
अँधेरे की सायँ-सायँ
बूढ़े नीम का स्याह तना
भीगे पत्तों की हरहराहट से भरा
देखता भौंचक, हैरान
मेरे दुख के हरेपन की काई को ओढ़े
मेरे पैरों की फिसलन को थामें
देखता रुग्णाई देह से
नीम मेरे पिता की तरह बूढ़ा हो गया है
मेरी माँ की झुर्रियाँ उभर आई हैं उसके तने में
मेरे हर्फ़ इन दिनों
उसकी पत्तियों की तरह झड़ रहे हैं
यहाँ-वहाँ बिखर रहे हैं हवा में
मैं देख रही हूँ नंगी आँखों से
दिशाहीन समय की अनियमित्ता को भागते हुए
जैसे भाग आई थी मैं
घर से
पिछले माह गंगा के घाट पर
बिना सोचे-समझे
प्रवाह ने बताया
लोग भटक जाते हैं गलत राहों में चलते हुए
लेकिन
नदी जानती है अपने बहने की दिशा
मैं टकरा रही थी
बहाव के विपरीत
हवा के थपेड़ों से
यह दुनिया एक भूलभूलैया में
तब्दील होती जा रही है
रात के इस पहर में
घोर शांति है
सन्नाटा कह रहा है
सभी दिशाएँ कहीं जाती हैं
लेकिन कहाँ?
नीम चुप क्यों खड़ा है
बरसों से!
बताओ तो?

3. निर्वासन का दर्द

इन दिनों
इस रुके हुए दौर में
विश्वास का चाबुक
पीठ को लहूलुहान किए है
हमारी आशाएँ जब्त कर ली गई हैं
हमारे सपनों के पैबंध
कटे हुए अंगों की तरह
नफ़रत से फेंक दिए गए है अँधेरे घने जंगल में
यह जंगल भेड़ियों के झुंड से घिरा है
नुकीले दाँतों से
टपकता हुआ खून
कौन देख पाएगा?
मैंने ईश्वर को लड़खड़ाते हुए देखा है
वह छोटी बच्ची जो रोज़ मुझे मंदिर में ले जाती थी
उदास है
निर्वासन का अर्थ वह नहीं समझती
नफ़रत और विश्वासघात भी नहीं जानती क्या है
लेकिन उससे छीन ली गई वे दीवारें
जहाँ उसने सीखी आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींचना
बनाना परिवार के चित्र
जहाँ एक वक्राकार रेखा से
बना देती है वह मुस्कान
दो चोटी वाला अपना स्केच
और लिखती है पापा पागल हैं
जिन दीवारों को
भर दिया था उसने
मांगलिक चिह्नों से,
निर्वासन सोती हुई बच्ची की आँख में एक तीर की तरह चुभा
और टपकने लगा खून
खाली कमरा अब चित्रों से नहीं
खून के छीटों से भरा है
बच्ची रो रही है
यह मेरे बचपन का घर है
मत निकालो!

4. बिना पुल की नदी

चल डूबें!
यह बिना पुल की नदी है
यह कहते हुए
उसने मेरा हाथ पकड़
नदी में छलांग लगा दी
मैं कश्तियों को
किनारे से बाँध आया था
वह छोड़ आई थी
घर की चौखट को
सदा के लिए
दो प्रेमियों को
नदी मिला भी सकती है
यह मर के जाना जाता है

5. अपरिजित भाषाओं का गुढ़

सबसे नुकीले सिरे
होने चाहिए कविताओं के
मैंने बरसों चिट्ठियाँ लिखी
हर बार पहुँच जाती
किसी अदृश्य पते पर
सुना था मौन अपरिचित भाषा का गूढ़ हैं
लेकिन कविताओं को तो मारक होना चाहिए
मीठे ज़हर और अच्छी बातों से मारे जाने का
दुख दीर्घगामी होता है
अभिव्यंजनाओं के दुराग्रह में
एक उफ़नती नदी
एक मौन के पुल से गुज़रती है
यह कितना बेमेल है
नदी चाहती है डूबना
पुल चाहता है पार होना!

6. प्रेम प्रेम गाकर उसने

प्रेम प्रेम गाकर उसने
प्रेम को इतना बेज़ार बना दिया था
कि अब प्रेम
आवारा हथिनी का भारी पैर था
जहाँ पड़ता एक गहरा निशान छोड़ जाता
गड्ढों को पाटने का भार
पीठ पर कूबड़ की तरह उग आया था
चेहरे को ढकती है ब्रांड के किसी दूधिया रंग से
वह सुबह उठती और चाय चढ़ा देती
चीनी कम डालती और मिठास के बारे में अधिक सोचती
अवरुद्ध है उन्मुक्त दौड़
उबलती हुई चाय को लौटा दिया जाता है
छलनी की छपाक से
पैन की तलहटी में
कोई पुकार नहीं है आस-पास
याद आती है रात की चीखें
वह जगाता है अपने आदिम पुरुष को
स्त्री की माद से अनभिज्ञ
जुझारू पुरुष दहाड़ता है
जीत के फर्ज़ी दस्तावेज़ों पर
हस्ताक्षर करके
और भूल जाता है सुबह
वह एक भरी-पूरी स्त्री थी!
__________________________________________
गीता मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने गृहविज्ञान में परास्नातक, बीएड व बीटीसी की शिक्षा प्राप्त की है। वे शामली जनपद उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालय में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। 

बुधवार, 9 अप्रैल 2025

पूनम सोनछात्रा

 1. लड़की मुस्कुराती है


न सिर्फ़ तस्वीरों में बल्कि आमने-सामने भी

लेकिन उसके मुस्कुराने से नहीं बजता जलतरंग
कोई इंद्रधनुष आसमान पर नहीं सजता
कहीं फूल नहीं खिलते
पक्षी चहचहाते नहीं हैं
और न ही हवा कोई गीत गुनगुनाती है

मुस्कुराहट के साथ
सुखी दिखने की चेष्टा लड़की का उद्यम है

और दुःख… लड़की का भाग्य
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2. आँख में पड़े तिनके सा है जीवन


जब तक रहता है
तब तक चुभता है
इतना छोटा
कि न कोई ओर मिलता है न ही कोई छोर

खप जाती है सारी ऊर्जा, सारा समय
इसे छोड़ने या इस से छूट जाने में
और जब यह छूटता है तो कुछ नहीं बचता
सिवाय….. धुंध और आँसुओं के
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3. लौटती आस के साथ


नहीं लौटता वही समय

समय बीत जाता है
बनी रहती है आस
ताकि बीतता रहे समय
आस… नियति की असीम संभावनाओं का कुचक्र मात्र है।
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4. दुःख और अकेलापन सहोदर हैं


किस ने पहले जन्म लिया
यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता

लेकिन वे साथ-साथ चलते हैं
एक-दूसरे के पूरक बन
स्वार्थी संसार को सहभागिता का पाठ पढ़ाते !

ख़ुशियाँ कम थीं और छोटी भी
दुःख अनादि, अनंत और अशेष

सुख आता-जाता रहा
लेकिन दुःख अनवरत रहा
हमेशा साथ
बावजूद इसके
हम इंसानों ने कभी दुःख की कदर नहीं की
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5. ब्रह्मांड की अनंत गतियों के मध्य


मेरे मन की अपनी गति है
मेरा दुःख और मेरे आँसू
किसी बिग बैंग सरीखी घटना की प्रतीक्षा में
इस समय केवल मुझ तक सीमित हैं

दसों दिशाओं में वक्रीय गति से
मुझे खींचता है दुःख
किन्तु मैं आँखें बंद किए, मुस्कुराते हुए
क्षितिज पर टिमटिमाते प्रकाश की दिशा में रेखीय चल रही हूँ
जानती हूँ
चाहे स्थिति कैसी भी हो,
‘द शो मस्ट गो ऑन’\
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6. मुक्ति 


चरित्र के समस्त आयाम
केवल स्त्री के लिए ही परिभाषित हैं

मैं सिंदूर लगाना नहीं भूलती
और हर जगह स्टेटस में मैरिड लगा रखा है

जैसे यह कोई सुरक्षा-चक्र हो
मैं डरती हूँ

जब कोई पुरुष मेरा एक क़रीबी दोस्त बनता है
मुझे बहुत सोच-समझकर

शब्दों का चयन करना पड़ता है
प्रेम का प्रदर्शन

और भावों की उन्मुक्त अभिव्यक्ति
सदैव मेरे चरित्र पर एक प्रश्नचिह्न लगाती है

मेरी बेबाकियाँ मुझे चरित्रहीन के समकक्ष ले जाती हैं
और मेरी उन्मुक्त हँसी

एक अनकहे आमंत्रण का
पर्याय मानी जाती है

मैं अभिशप्त हूँ
पुरुष की खुली सोच को स्वीकार करने के लिए

और साथ ही विवश हूँ
अपनी खुली सोच पर नियंत्रण रखने के लिए

मुझे शोभा देता है
ख़ूबसूरत लगना

स्वादिष्ट भोजन पकाना
और वे सारी ज़िम्मेदारियाँ

अकेले उठाना
जिन्हें साझा किया जाना चाहिए

जब मैं इस दायरे के बाहर सोचती हूँ
मैं कहीं खप नहीं पाती

स्त्री समाज मुझे जलन और हेय की
मिली-जुली दृष्टि से देखता है

और पुरुष समाज
मुझमें अपने अवसर तलाश करता है

मेरी सोच... मेरी संवेदनाएँ
मेरी ही घुटन का सबब बनती हैं

मैं छटपटाती हूँ
क्या स्वयं की क़ैद से मुक्ति संभव है?

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पूनम सोनछात्रा

 












पूनम सोनछात्रा का जन्म 7 अप्रैल 1982 में छत्तीसगढ़ के भिलाई नामक स्थान पर हुआ। इन्होंने गणित में एम.एस.सी की। वर्तमान समय में पूनम जी अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं डिजिटल पटल पर इनकी कविताएँ और ग़ज़लें प्रकाशित होती रही हैं। 'एक फूल का शोकगीत' इनका प्रसिद्ध कविता संग्रह है। 
ईमेल: poonamsonchhatra@gnail.com

बुधवार, 19 मार्च 2025

एकता वर्मा

 1. नमक


जिनके लिए कहा गया था
मज़दूरी पसीना सूखने से पहले मिल जानी चाहिए,
समंदर उनके पसीने से बने हैं।

घर की रसोई में
उसी समंदर का
डब्बा बंद नमक रखा है।

सभ्यताओं के आरंभ में
निर्वासित समंदरों की यह सांद्र खेप
संस्कृति की रोटी पर
चुटकियों से बुरककर खायी जा रही है
अपने-अपने स्वादानुसार।
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2. सारकेगुड़ा


बुधिया महुवा की छाल पर गीली मिट्टी लेस रही है।
उसमें गोलियों के कई सूराख हैं।

वह ऐसा इसलिए नहीं कर रही कि उसके घर के दो जने;
उसका पति और बेटा
छाती और कनपटी में हुए ऐसे ही सूराख से मारे गए हैं

वह ऐसा कर रही है क्योंकि
उस अकेले पेड़ ने
उसके घर की तीन पीढ़ियों को पाला था
और अब उसकी बारी थी।
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 3. लोहा


शहर के स्त्री रोग विभाग के बाहर
औरतों की लंबी क़तार है।

डॉक्टर खून जाँचती है,
देती है सबको
-आयरन की गोलियाँ।

समझ से परे है,
शहर भर की इन औरतों के खून का लोहा
आख़िर कहाँ चला गया?
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 4. रोटियाँ


रोटियों की स्मृतियों में आँच की कहानियाँ गमकती हैं।

अम्मा बताती हैं,
सेसौरी के ईंधन पर चिपचिपाई सी फूलती हैं रोटियाँ
सौंफ़ला पर सिंकी रोटियाँ धुँवाई; पकती हैं चटक-चटक
नीम के ईंधन पर कसैली सी, करुवाती हैं रोटियाँ
पर, अरहर की जलावन पर पकती हैं भीतर-बाहर बराबर।

अम्मा का मानना है, शहर रोटियों के स्वाद नहीं जानते
स्टोव की रोटियों में महकती है किरोसिन की भाप
और ग़ैस पर तो पकती हैं, कचाती, बेस्वाद, बेकाम रोटियाँ।

रोटियों की इन सोंधाती क़िस्सागोई के बीचों-बीच
मेरे सीने पर धक्क से गिरता है एक सवाल
सवाल कि –
गाजा की रोटी कैसी महकती होगी?

गाजा की रोटी कैसी महकती होगी,
जिसे सेंक रही हैं बुर्कानशीं औरतें ध्वस्त इमारत के बीचों-बीच
उन्हीं इमारतों का फ़र्नीचर जलाकर।

क्या गाज़ा की रोटियों में महकता होगा खून
अजवाइन की तरह बीच-बीच में
कि राशन के कैंप में,
रक्तरंजित लाशों बीच से खींचकर लायी जाती हैं आँटे की बोरियाँ

क्या किसी कौर में किसक जाती होगी कोई चिरपरिचित ‘आह’
कि चूल्हे के ठीक नीचे, मलबे की तलहटी में
दफ़्न हो गए उस परिवार के सात लोग एक ही साथ

इन रोटियों को निगलते हुए गले में अटकता होगा
उन किताबों का अलिफ़,
गृहस्थी की सबसे व्यर्थ सामग्री की तरह
जिन्हें सुहूर की दाल बनाने में चूल्हे में झोंक दिया गया

क्या गाज़ा की रोटियाँ
कचाती सी,
तालु में चिपकती होंगी
कि पूरा देश जल जाने बावजूद
दुनिया देखती है फ़िलिस्तीन की तरफ़, अब भी बहुत ठंडी, सूखी आँखों से।
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 5. मृत्यु के चरण


रात के 2:30 बजे हैं।
आसमान के कोने आगज़नी की रौशनी में लपक रहे हैं।

अल-अक्शा अस्पताल के शीशों पर
खून से उठी भाप
जमा होकर धीरे-धीरे टपक रही है।

एक बहुत छोटी बच्ची है,
जिसके रूई जैसे गाल, लपट से छूकर
रूई की तरह ही झुलसकर ग़ायब हो गये हैं।
भीतर के जबड़े झांक रहे हैं,
उनमें अभी पूरे दांत नहीं उगे हैं।
ज़रूर वह बोलती होगी, तब तुतलाती होगी।
अभी मर्मांतक कराह में काँप रही है।

डॉक्टर अब उसका इलाज नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उसका मरना तय है।
लेकिन सिर्फ़ मरना उसकी नियति नहीं है
उसको पीड़ा के अनंत नरकों से गुज़रकर, फिर मरना है।

अस्पताल में मॉर्फ़िन नहीं है
या जो है भी, उसे मरते हुए आदमी पर खर्च नहीं किया जा सकता।
किंतु, यह नियति भी उसका अंत नहीं है!

उसको मरने में जितना समय लगेगा
उस समय के लिए उसको रखने की कोई जगह शेष नहीं बची है
न घर, न पड़ोस, न जबलिया, न फ़िलिस्तीन, न दुनिया, कब्र में भी अभी नहीं।

इसलिए
लाल, हरे, सफ़ेद, काले रंग के चीथड़ों में लिपटी
वह रूई से गालों वाली, तोतली बोली वाली सद्यःअनाथ बच्ची
मरने तक के लिए इमरजेंसी वार्ड के फ़र्श पर रख दी गई है।
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 6. समाज उन्हें मर्दाना कहता है।


जो राजाओं के युद्ध से लौटने का इंतज़ार नहीं करतीं
उनके पीछे जौहर नहीं करतीं,
बल्कि निकलती हैं संतान को पीठ पर बांधकर,
तलवार खींचकर रणभूमि में

समाज उन्हें मर्दाना कहता है!

जो थाली में छोड़ी गई जूठन से संतोष नहीं धरतीं
जो अपनी हथेलियों से दरेरकर तोड़ देती हैं भूख के जबड़े
जो खाती हैं घर के मर्दों से ड्यौढ़ी खुराक
और पीती हैं लोटा भर पानी

समाज उन्हें मर्दाना कहता है।

जिनके व्यक्तित्व में स्त्रियोचित व्यवहार की बड़ी कमी होती है
जिनकी चाल में सिखाई गई सौम्यता नहीं है,
स्त्रीत्व नहीं, बल्कि गुरुत्व के अनुकूल
जो धमककर चलती हैं, टाँगे खोलकर; पसरकर बैठती हैं

जिनके खून की गर्मी सारे षड्यंत्रों के बावजूद शेष है

समाज उन्हें मर्दाना कहता है।

जो गरज सकती हैं, क्रोध में बरस सकती हैं
आशंकाओं से निश्चिंत
जो अपनी जंघाओं पर ताव देकर खुले आम चुनौती दे सकती हैं
भरी सभा मूछे ऐंठ सकती हैं
मूछदार बेटियाँ जन सकती हैं

समाज उन्हें मर्दाना ही कहता है।

वे, मर्दानगी के खूँटे में बंधी सत्ता को
उसके नुकीले सींघों से पकड़कर दुहती हैं

घर की इकलौती कमाऊ लड़कियों से लेकर
प्रदेश की मुख्यमंत्री
अथवा देश की प्रधानमंत्री तक
वे सभी औरतें, जो नायिकाओं की तरह सापेक्षता में नहीं,
अपितु एक नायक की भाँति जीती हैं केंद्रीय भूमिकाओं में।

यह समाज, यह देश मर्दाना ही कहता है।

इसलिए प्राची, तुम्हें जब यही समाज
मर्दाना कहे,
तो तुम गर्व से मुस्कुराना।
तुम अपनी कॉपी में स्त्रीत्व को बहुत सुंदर, नए ढंग से लिख रही हो।
_____________________________________
 

एकता वर्मा


 







एकता वर्मा, जन्म: 24 अप्रैल 1996
हरदोई, उत्तर प्रदेश से। वर्तमान में CWDS (Centre for Women Development Studies) में 'चाँद' पत्रिका पर शोधरत। दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘विश्व साहित्य की अवधारणा और ‘वर्ल्ड लिटरेचर टुडे’ पत्रिका में प्रकाशित हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन’ विषय पर शोध कार्य। सामाजिक एवं राजनैतिक मुद्दों में विशेष रुचि एवं उन पर लिखीं रिपोर्ट ‘न्यूज़क्लिक’, ‘मीडिया विजिल’ आदि में प्रकाशित। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका TMYS review के ‘आदिवासी विशेषांक’ जून 23 अंक में अनूदित कविताएँ प्रकाशित। कई पत्रिकाओं में शोध-आलेखों का प्रकाशन। ‘रमा मेहता स्मृति लेखन पुरस्कार 2024’ से सम्मानित। नई धारा, नई आवाज़ें 2024 से सम्मानित। 
संपर्क : ektadrc@gmail.com एवं everma.edu@gmail.com








बुधवार, 12 मार्च 2025

अनुजीत इक़बाल

1. नया राग


आखिर एक दिन वह क्षण भी आएगा
जब तुम, समय की देहरी पर खड़े
स्वयं को निहारोगे और
स्वयं का ही अभिवादन करोगे

संध्या के अस्त होते आलोक में
जब आकाश गोधूली रंगों से भर जाएगा 
और दूर मंदिर की घंटियाँ 
किसी भूले-बिसरे स्वर को जाग्रत करेंगी
तुम खुद को कहोगे, “आओ, विश्राम करो अब, बहुत हुआ...”

राग यमन की मधुरता में डूबा क्षितिज
धीमे-धीमे तुम्हें अपनी बाँहों में समेटने लगेगा
सप्तक के मध्यम सुर पर थिरकते सरोद और सितार की ध्वनियाँ
तुम्हारे मन के रिक्त कोनों को भरने लगेंगी

तुम अपनी उस विलुप्त छवि को आलिंगन दोगे
जो अनवरत तुम्हारे साथ चली
पर तुमने उसे कभी अपना नहीं माना
तुम उसके हाथ में धरोगे वह सारा प्रेम
जिसे तुम लोगों को अर्पित करते-करते
स्वयं रिक्त हो गए थे...
और वह छवि प्रतीक्षा करती रही
राग अहीर भैरव की तरह
जो भोर में फिर से स्वर पा सके…

अब, वह राग फिर से लौटेगा
राग संधिप्रकाश, जिसे केवल संध्या जानती है

फिर तुम अपने हृदय से झरने दोगे
वह समस्त विषाद, वे अवसन्न स्वर
वे विफल स्वप्न
जो आजीवन शोकगीत बने रहे
और तब, झंकार उठेगी
रात्रि के गंभीर आकाश में, राग मालकौंस की

रुद्रवीणा की कंपन भरी ध्वनि
जब रात्रि के प्रथम प्रहर में घुल जाएगी
और पखावज की थाप गूंजेगी
तब तुम अपनी ही धुन में खो जाओगे

और स्वयं का मंगल गान करते हुए  
रचोगे एक नया राग
_____________________________________

2. कामना


युगों से अभिशप्त 
मेरे स्वछंद हृदय की कामना
विस्थापित हो सूर्य हुई
जिसकी ऊष्मा से
मेरे समस्त दुश्चरित्र स्वप्नों के बीज
अंतहीन विस्तार पा गए
और तुम्हारे मौन प्रेम के जल से
रक्त पुष्प प्रस्फुटित हुए

मेरे बोधिसत्व प्रेम
तुम आना अपने स्फुट उत्कर्ष में
मेरे ऊर्जा केंद्र जाग्रत करने

मैं चाहती हूँ तुम अपने ईश्वर को नकार दो
और मेरे उन्माद को विक्षिप्तता में बदल दो
जैसे प्रकृति अनगढ़ मौन में
निर्माण को विध्वंस में बदल देती है
और फिर आता है
परम स्थैर्य

तुम्हारे हाथ के कंपन 
मेरी अबूझ, अदेह भाषा समझते हैं
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3. वचन


हे प्रियतम
तुम्हारा अघोर रूप
किसी सर्प की भांति
मेरे हृदयक्षेत्र में
कुंडली मार बैठ गया है
और मैं वैराग्य धारण करने के पश्चात
प्रेमविह्वल हो रही हूँ 

गेरुए वस्त्र त्याग कर
कौमुदी की साड़ी ओढ़ कर
तृष्णा के ज्वर से तप्त
मैं खड़ी हूँ तुम्हारे समक्ष
चंद्र की नथनी डाल कर


तुम्हारी समस्त इंद्रियाँ 
हिमखंड की भांति स्थिरप्रज्ञ हैं
लेकिन दुस्साहस देखो मेरा
तुमसे अंकमाल होते हुए 
प्रक्षालन करना चाहती हूँ 
तुम्हारी सघन जटाओं का

मोक्ष के लिए 
मुझे किसी साधना की आवश्यकता नहीं
समस्त कलाओं का रसास्वादन करते हुए
मेरी कलाई पर पड़ा
तुम्हारे हाथ की पकड़ का नील
काफी होगा
मुझे मुक्ति दिलाने के लिए

वचन देती हूँ 
वो दिन अवश्य आएगा
_____________________________________

4. पैंडोरा बॉक्स 


मन की अतल गहराइयों में
एक बक्सा पड़ा है
बंद, जर्जर, धूल से ढका
पर भीतर…
आवाज़ें गूंजती हैं

सपनों के छिन्न अवशेष
कुछ रक्तरंजित यथार्थ 
कुछ घाव, जो स्पर्श मात्र से
रिसने लगते हैं 

यह बक्सा खुलते ही
हवाओं में घुल जाएगा
विष का पुराना स्वाद
रातें फिर से डरावनी हो जाएंगी 

फिर भी
कब तक सिसकियों को 
चुप रहने का आदेश दिया जाए 
कब तक तड़प को शब्दों से वंचित रखा जाए
कब तक मौन के आवरण में
घावों को सड़ने दिया जाए

आज नहीं तो कल
इस पैंडोरा के बक्से को खोलना ही होगा

और फिर समय
एक निर्दयी वैद्य की भाँति
किसी दिन संधान करके 
विष की गाँठ खोल देगा

और हम...
अग्निस्नान करके 
निर्बंध, मुक्त, निर्वसन
पुनः जन्मेंगे
_____________________________________

5. मायोसोटिस के फूल 


आकाश पर धूम्र-पुष्प दिखने लगे हैं 
बिखर रहे हैं जो हर जगह अव्यवस्थित 
और एक तीव्र तड़प
एक असीम विक्षोभ भरा है 
जिसे बरस कर रिक्त होना है

पहाड़ की एकाकी धूसर पाल के पीछे 
छिप गया है सूरज 
जो कर गया है खत्म दिन को
अपने सुनहरी वज्र के साथ

और अब मुझे दिखती है 
आकाश में उल्टी बहती हुई एक नदी

हरियाली रहित खड़ी चट्टानों
और सूखे अरण्यों का
उत्कट एकाकीपन है मुझ में 
उपेक्षा और अमर्ष से उन्मत्त
देवताओं से श्रापित हूँ मैं

विनम्रता से स्वीकार करने दो कि 
मायोसोटिस के रहस्यमय नीले फूल की
पीली अबाबील जैसी आँखें 
याद दिलाती हैं तुम्हारी 
_____________________________________


6. प्रेम


हे महायोगी
जैसे बारिश की बूंदें
बादलों का वस्त्र चीरकर
पृथ्वी का स्पर्श करती हैं
वैसे ही, मैं निर्वसन होकर
अपना कलंकित अंतःकरण
तुमसे स्पर्श करवाना चाहती हूँ 

तुम्हारा तीव्र प्रेम, हर लेता है
मेरा हर चीर और आवरण
अंततः बना देता है मुझे
“दिगंबर”

थमा देना चाहती हूँ अपनी
जवाकुसुम से अलंकृत कलाई 
तुम्हारे कठोर हाथों में
और दिखाना चाहती हूँ तुमको
हिमालय के उच्च शिखरों पर
प्रणयाकुल चातक का “रुदन”

मैं विरहिणी
एक दुष्कर लक्ष्य साधने को
प्रकटी हूँ इन शैलखण्डों पर
और प्रेम में करना चाहती हूँ 
“प्रचंडतम पाप”
बन कर “धूमावती” 
करूंगी तुम्हारे “समाधिस्थ स्वरूप” पर 
तीक्ष्ण प्रहार 
और होगी मेरी क्षुधा शांत


हे महायोगी, मेरा उन्मुक्त प्रेम
नशे में चूर रहता है


धूमावती- दस महाविद्याओं में पार्वती का एक रूप, जिसने भूख लगने पर महादेव का भक्षण किया था।
___________________________________


अनुजीत इक़बाल















अनुजीत इकबाल हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखती रही हैं। अनुजीत जी लखनऊ में पुस्तक मेला द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की हिंदी और कविता लेखन और अंग्रेजी कविता लेखन प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान एवं सम्मान अर्जित कर चुकी हैं। अंग्रेजी कविता के लिए इन्हें कोलंबिया से 'Antonio Machado National Universal Award' और 'Ruben Dario Award' भी प्राप्त है। विभिन्न संस्थाओं द्वारा पेंटिंग,लेखन, योग के लिए 150 से अधिक सम्मान पत्र प्राप्त।'हिंदवी','स्त्री दर्पण','गृह शोभा' दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के 'स्त्रवंति', भारतीय भाषा परिषद की 'वागार्थ', 'गर्भनाल' पत्रिका, 'शुभ तारिका','जानकीपुल','पोषमपा', 'विभोम स्वर','नवभारत टाइम्स','हम हिंदुस्तानी अमेरिका', 'हिंदी अब्रॉड' कनाड','साहित्य कुंज'आदि देश-विदेश सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2025

वंदना मिश्रा

 1.आदेश 

        
 उठो!
 कहा तुमने मेरे बैठते ही
 जबकि बैठी थी मैं
 तुम्हारे ही आदेश पर।

 डाँटा तुमने इस बेमतलब की
 उठक-बैठक पर,
 फरमाया दार्शनिक अंदाज़ में
 कितनी प्यारी लगती हो 
 डाँट खाती हुई तुम
 मैं खिल उठी।

 देखा सिर से पाँव तक तुमने
 और कहा "क्या है ही प्यार करने लायक तुम में"।

 मैं सिमट गई 
 सारी ज़िंदगी देखा
 मैंने खुद को 
 तुम्हारी नज़र से 
 और खुद को
 कभी प्यार ना कर सकी।
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2. कितना जानती है स्त्री अपने बारे में 

        
कितना जानती है स्त्री अपने बारे में
अपनी पसंद, नापसंद के विषय में 
शायद बेमतलब लगे उसे 
इस तरह सोचना।

दहशत होती है शायद देखने में 
गहरे दबे सपनों वाले मन को 
जहाँ दबी पड़ी है 
उसकी गुड़ियों की
रेशमी चुन्नी
सजीले गुड्डे की पाग और सखियों के
गीत।

झूले के ऊँचे पेंग और खनकती चूड़ियों 
को चीरकर आती 
किसी राजकुमार की आवाज़

डरती है स्त्री सपनों से 
जिस समय डूबी होती है प्रेम में
उस क्षण भी नकारती है 
ऐसा सचमुच होने से 

उम्मीदों की बारिश में भीगती है
औरत डरते-डरते।
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3. गुलाबी मौसी 
     

जब से होश संभाला 
उन्हें झुर्रियों की झोली ही पाया

बाल-विधवा थी ‘गुलाबी मौसी’
क्या मज़ाक कि
जिसके जीवन से 
सभी रंग को ख़ारिज होना था
उनका नाम
रख दिया गया था 'गुलाबी'।
कभी ससुराल की दहलीज़ पर
क़दम नहीं रखा।

हम उन्हें 
कभी ‘रोज़ी मौसी' कहते, कभी ‘पिंकी’
माँ से बीस बरस बड़ी रही होंगी शायद

माँ को तो,
अपनी माँ की याद ही नहीं थी
गुलाबी मौसी ने ही पाला था उन्हें
(जिन्हें माँ ‘बहिन' कहती थी )

बिना माँ-बाप के पले-बढ़े 
पिता जी की लापरवाहियों को 
प्यार से ढक देती थी मौसी
अपने पास रखी 
नई-नकोर साड़ी और गहनों से

कहती समाज में सबको दिखा 
'देखो वकील साहब की पसंद अच्छी है
पत्नी के लिए 
कितना सुंदर सामान लाएँ हैं
अब सब समझ जाएँ तो उनकी बला से'
कौन लड़ सकता था उनसे।

सबकी इज़्ज़त
यूँ ही संभालती थी
सबका काज-परोजन।

जब से होश संभाला
उन्हें सफ़ेद किनारी वाली 
साड़ी में ही देखा
बालों को लपेटकर जूड़ा-सा
बना लेती,

सगा भाई कोई था नहीं 
पर थे 
सगों से बढ़कर 
मौसी हम लोगों के लिए उनसे लड़ती 
हमारे 'जमैथा' जाने पर।

और उनके बच्चों के लिए हमसे लड़ती 
हमारे घर आने पर।

किसी के न होने के ज़माने में 
हम सबकी थी वो।

नाना बहुत समझाने पर 
जीते-जी अपने खेतों पर 
उनका हक़ 
लिख गए थे
पर बेचने और किसी को देने का नहीं
वो बाद में आधा-आधा 
मिला दोनों चचेरे मामाओं को।

अपनी रुपयों की थैली छिपाकर रखती 
खाना कम खाती
पैदल चलती दूर तक 
धूप-धूप घूमती खेतों में 
मज़दूरों से लड़ती-झगड़ती 
ज़रा-ज़रा से पैसों के लिए 
दो धोती से काम चला लेती।

शादियों में माँ के लिए चौक 
और दुल्हन के लिए 
गहने कपड़े लाती मौसी
रस्मों पर छिप-छिप जाती 
अपशगुन के भय से।
लाख कहने पर भी कटती-सी थी

माँ के बाद गई
कहती "मौत को भी मैं पसंद नहीं"

अपने लिए कभी कोई सुविधा नहीं ली 
हमें जितना देती 
और-और चाहते 
हम कहते  
बड़ी कंजूस हैं 'गुलाबी मौसी'

भाई चिढ़ाते 
“तुम्हारे भोज में क्या-क्या बनेगा मौसी?
पैसा लगाएंगे हम लोग"
अभी दे दो न
तुनक कर कहती वो  
“हम अपना इंतज़ाम करके जाएँगे।"

सचमुच अंतिम समय में 
सबकी सदाशयता को ठुकरा
उनके तकिया के नीचे से  
क्रिया-कर्म और सब कार्यक्रम के लिए 
मिले पैसे एक चिट के साथ

सोचती हूँ
कितना कम भरोसा था उन्हें
हम सब पर।

'गुलाब दिवस' पर 
जब सब डूबें हो 
गुलाब के प्रेम में
मुझे हर बार
क्यों याद आ जाती हैं?
'गुलाबी मौसी'!
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 4. किताबें

किताबों की अलमारी से
निकालने जाइए कोई किताब
तो और किताबें बच्चों की सी 
ज़िद्द कर फैलाने लगती हैं हाथ
हम भी, हम भी
ज़रा-सा छू लो हमें भी।

जाने कब से बैठे हैं 
इस बंद अलमारी में
मुँह फुलकर कहती हैं
 
दिनों से पन्ने नहीं 
पलटे गए हमारे
हवा पानी धूप की ज़रूरत नहीं क्या हमें!

किंचित रोष से कहती हैं 
क्यों इकट्ठा किया था जब पढ़ना नहीं था?

पुचकारते आश्वासन देते किसी तरह
लौटे वहाँ से तो 
हाथ की किताब का 
प्रसन्न मुख पुलकित कर देता है।

पुरानी पढ़ी क़िताब को दोबारा पढ़ने पर
लगता नहीं क्या?
जैसे मिल रहे हों
किसी पुराने मित्र से 
जिसकी हर बात जानते हों
इतनी अच्छी तरह से 
कि प्रायः आप दोनों के 
मुँह से, निकलने लगती हो
एक-सी बात।

कभी-कभार जाने पहचाने अक्षर भी,
खोलने लगते हैं
अपना अनजाना अर्थ,
जैसे अपरिचय का संकोच
टूटा हो, 
अब जाकर 
जैसे देखा हो हमने
किसी मित्र का 
बिलकुल नया रूप 
बरसों बाद।
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5. सिर्फ़ दवा नहीं

     
अपनी शारीरिक पीड़ा को
ग़लती की तरह
बताती 

बढ़ती उम्र को
ग्लानि की तरह
लेती स्त्रियों को

सिर्फ़ दवा नहीं
प्रेम का मरहम भी देना।
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6. कोई गुनाह नहीं 

        
कोई गुनाह नहीं किया तुमने कि
छुप जाओ तुम किवाड़ों की ओट में

कि निराश लौटे पिता को 
और मत थका बच्ची

कि तेरे प्यार से पानी पकड़ाने से 
धुल जाएगी उनकी उदासी

एक प्याला गर्म चाय का 
रख उनके सामने
और प्यार से पकड़ उनका हाथ
समझा उन्हें कि
तो क्या हुआ 
जो नहीं तय कर पाए विवाह 
बोल कि यूँ ही भटका न करो 
इस उसके कहने पर
लड़के खोजने 

कि इतनी क्या जल्दी है
मुझे घर से निकालने की
हल्के से छुओ 
उनके मुरझाए चेहरे को
और बताओ
कि कितनी तो सुकून से भरी रहती हो
उनके साथ 
पूछो थोड़ा रूठकर कि
यूँ कौन तड़पता है 
अपने दिल के टुकड़े को 
दिल से दूर करने के लिए।

मुस्कुराओ 
कि पिता के पास हो तुम 

मुस्कुराओ 
कि तुम्हीं 
ला सकती हो मुस्कुराहट
पिता के चेहरे पर।
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वंदना मिश्रा 















वंदना मिश्रा हिंदी साहित्य में सक्रिय रूप से लिखती रही हैं। इनके तीन कविता संग्रह 'कुछ सुनती ही नहीं लड़की', 'कितना जानती है स्त्री अपने बारे में', 'खिड़की जितनी जगह' प्रकाशित हैं। 'महादेवी वर्मा का काव्य और बिंब शिल्प' तथा 'समकालीन लेखन और आलोचना' कृतियाँ भी प्रकाशित हो चुकी हैं। हिंदवी, कविता कोश, गूँज, बिजूका, पहली बार, लोकराग, समकालीन जनमत, अनहद एवं कोलकाता वेबपोर्टल पर भी इनकी कविताएँ  प्रकाशित होती रहीं हैं।
          



बुधवार, 1 जनवरी 2025

डॉ. वंदना मुकेश

1. जनता का दुख जनता के सर


सूरज ढलक गया धीरे से, पंछी भी आ पँहुचे घर।
शाम सुहानी सरक गई, रात ने बदले हैं तेवर।
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।

अफ़ग़ानी हो या यूक्रेनी, लोग हुए कितने बेघर
न रोटी, न तन पर कपड़ा, झुके हुए इंसानी सर।
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।

काम नहीं व्यापार नहीं, कैसे होगी गुज़र-बसर
गिरवी रक्खा नहीं मिलेगा, कंगन, हँसुली या बेसर।
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।

ग़ाज़ा हो या इज़रायल, मानवता घायल-घायल।
सर पर छत न धरती नीचे, लटके हैं सब अधर-अधर
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।

किसी को रोटी के हैं लाले, कोई खाए घी से तर।
बचपन भूखा, बचपन सूखा, ठोकर खाता है दर-दर।
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।

बम-गोले हथियार बनाते, आग बेचते जीवन भर
रिश्ते-नाते धू-धू स्वाहा, बच पाता क्या जीवन पर।
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।

जो सुलगाते वही बुझाते, पहन मुखौटा नेता बन
वो बैठे महलों में लेकिन, जनता के मन व्याप रहा डर
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।

क़समें-वादे झूठे सारे, सच खोया है इधर-उधर।
टीवी-चैनल, अख़बारों में, झूठी है हर एक ख़बर
कोई राजा कोई मंत्री, जनता का दुख जनता के सर।
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2. उगन


जब-जब मैं
भीतर से
उगना चाहती हूँ
कुकर की सीटी,
दरवाजे की घंटी रोक
लेती है
मैं बंद कर देती हूँ गैस
खोल देती हूँ दरवाज़ा
और फिर

विलीन हो जाती है उसमें
आलोढ़ित होती
मेरी उगन
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3. डैफोडिल्स


सुनो,
क्यों उदास हो तुम?
देखो तो सही, इधर
लो हम फिर आ गए।
क्या कल तुमने देखा था हमें?
हम मतवाले तो सूरज की सुनते हैं!
हमें खिलने से रोक नहीं पातीं,
संसद और सरकारें।

और वे कमज़ोर बुझदिल आतंकवादी!
कुचल तो सकते हैं लेकिन रोक नहीं पाते
हमारा यों खुलकर खिलखिलाना
न ही अनदेखा कर पाते हैं,
तुम्हारे जैसे, असमंजस में जीते कुछ लोग
तुम भी खिल उठो न!
हमारी ही तरह
सूरज की रौशनी में
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4. पुल मत तोड़ो


इंसान के आविष्कारों में
मेरा पसंदीदा है पुल
छोटा हो या बड़ा
संकरा हो या चौड़ा।
लताओं का, लकड़ी का
या फिर हो चमड़े रस्सी का।
मुझे सभी तरह के पुल बहुत भाते है
ऐसा ही एक पुल बाँधा था
राम ने,
असत्य से सत्य तक
कुनीति से सुनीति तक
पुल हमेशा आगे बढ़ने का
रास्ता बताते हैं
पुल का काम जोड़ना है
मित्र भी पुल ही होते हैं
रास्ते भी पुल होते हैं,
पशु और पक्षी भी,
पुल ही होते है
माता-पिता, भाई-बहन
रिश्ते-नाते।
इन्हीं पुलों पर चलकर
हम बड़े होते हैं ।
फिर, जब
हम इनसे भी बड़े हो जाते हैं
तो पुल टूट जाते हैं
हम अकेले हो जाते हैं
पुल फिर बहुत याद आते हैं
पर पुल तो टूट चुके होते है।
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5. शोर


मैं कुछ कहती हूँ
तुम भी कुछ कहते हो।
जो मैं कहती हूँ
कुछ वैसा ही तुम भी कहते हो।
न तुम सुनते हो
न मैं सुन पाती हूँ
हम किसी को सुनना नहीं चाहते
सब बोल रहे हैं
लगातार बोल रहे हैं।
शब्द तीर से आर-पार हो रहे हैं
कुर्सी पर टिककर
आँखों की चिक बंद कर
मैं सुनती हूँ शोर
थक गई हूँ मैं
कभी सिर्फ़ सुनो
अच्छा लगेगा,
संवाद के लिए 
सुनना ज़रूरी है।
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डॉ० वंदना मुकेश














डॉ० वंदना मुकेश का जन्म 12 सितंबर 1969 में मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में हुआ। वे वॉलसॉल कॉलेज में अँग्रेजी की प्राध्यापिका तथा कैंब्रिज अंतरराष्ट्रीय परीक्षा विभाग में हिंदी परीक्षक रह चुकी हैं। 'नौवें दशक का हिंदी निबंध साहित्य-एक विवेचन' (शोध प्रबंध), 'मौन मुखर जब' (काव्य संग्रह), 'वंदना मुकेश-संकलित कहानियाँ' और 'मॉम, डैड और मैं' (उपन्यास में सहलेखन) उनकी प्रकाशित रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने तीन पुस्तकों का संपादन भी किया है। कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, साहित्यिक पुस्तकों एवं वेब-पत्रिकाओं में इनके लेख, शोध प्रपत्र, कविताएँ, कहानियाँ, संस्मरण, समीक्षाएँ प्रकाशित होती रही हैं। वंदना जी को विश्व हिंदी सचिवालय पुरस्कार, विश्व हिंदी साहित्य परिषद का सृजन भारती सम्मान, हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार द्वारा विशिष्ट सम्मान तथा भारतीय उच्चायोग लंदन द्वारा डॉ० लक्ष्मीमल सिंघवी अनुदान प्राप्त है।

बुधवार, 26 जून 2024

हर्षिता पंचारिया

विषतंत्र

अपने तंत्र को मजबूत करने के लिए 

उन्होंने चुना साँपों को,

तालाब की मछलियों की संख्या

अधिक होने के बावजूद 

दानों की लड़ाई ने उन्हें इतना कमजोर बना दिया  कि

सांप के फुफकारने मात्र से मछलियाँ

तितर-बितर हो गईं,

बावजूद इसके कुछ मछलियों ने साँपों को 

अपना देवता माना|


क्योंकि साँपों ने केंचुली बदल ली थी|


अब चढावे में साँपों ने दूध माँगने की जगह

बस इतना कहा कि

केंचुली बदलने से सांप विषधर नहीं रहते|

मूर्ख मछलियाँ दानों के लालच में

सांप की प्रकृति भी भूल गईं|


काफ़ी समय से

तालाब पर अब सफ़ेद कपोत नहीं दिखते,

और अब मछलियों के अनाथ बच्चों ने साँपों को

अपना सर्वोच्च नेता मान लिया है,

जिन्होंने उन्हें भ्रम में रखा है कि

वो उन्हें विषैले तालाब से आज़ादी दिलाएँगे| 


अब मछलियाँ मरती जा रही हैं

तालाब सूखते जा रहे हैं

और साँपों का क्या है

उन्हें तो बस विष उगलना है

चाहे तालाब में या

तालाब के बाहर|

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नरभक्षी

जाते जाते उसने कहा था,

नरभक्षी जानवर हो सकते हैं

पर मनुष्य कदापि नहीं,

जानवर और मनुष्य में

चार पैर और पूंछ के सिवा

समय के साथ 

यदि कोई अंतर उपजा था

तो वह धर्म का था


फिर सभ्यता की करवटों ने धर्म को

कितने ही लबादे ओढ़ाएँ ,

पर एक के ऊपर एक लिपटे लबादों में

क्या कभी पहुँच पायी है कोई रोशनी?


धीरे धीरे अँधेरे की सीलन ने

जन्मी बू और रेंगते हुए कीड़े,

वे कीड़े जो आज भी

परजीवी बनकर जीवित हैं

मनुष्य की बुद्धि में,

जो शनै: शनै: समाप्त 

कर देंगे मनुष्य की मनुष्यता को|


जाते जाते मुझे उससे पूछना था

मनुष्यता की हत्या होने पर भी

क्या धर्म का जीवित रहना साक्ष्य है

मनुष्य के नरभक्षी नहीं होने का?

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मूर्ख

उसने कहा, तुम मूर्ख हो!

मैंने सहजता से स्वीकार कर लिया|

हाँ....मैं मूर्ख हूँ, दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ख!

मेरी स्वीकारोक्ति ने तो जैसे आग में घी डाल दिया हो|

उसने कहा, तुम जैसों का कुछ नहीं हो सकता!

मैंने कहा, वह तो और भी अच्छा होगा....

आप जैसों का समय बच जाएगा|

अब उसका क्रोध सातवें आसमान पर था|

 उसने कहा, तुम्हारे जैसे लोगों की वजह से ही

यह दुनिया नर्क हो रखी है!


मैंने संयमित होकर कहा,

ताकि आप जैसे लोग, शायद इसे स्वर्ग बना सकें....

वह धम्म धम्म करता हुआ चला गया पर....

उसकी बड़बड़ाहट में मैंने यह सुना कि,

सयाने लोग सही कहते हैं-

'मूर्खों से मुंहजोरी जी का जंजाल है!'

जबकि मैं....

उससे चिल्ला-चिल्ला कर कहना चाहती थी कि

'मूर्ख बने रहना इसलिए भी जरूरी है

ताकि बुद्धिमानी का दंभ जीवित रहे

और

जंजालों के जाल में बुद्धिमानों का वर्चस्व कायम रहे!'

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निषिद्धता

हे मृत्यु!

कितनी निष्ठुर हो गई हो तुम!


इतनी कि रुक ही नहीं रही हो

असंख्य वेदनाओं के रुदन से

अनंत प्रार्थनाओं के स्वर से

और अब,

इन हथेलियों की रेखाओं को भी नहीं पता कि

कितनी दिशाओं से आओगी तुम|


मृत्यु कहती है कि

यहाँ जीवन निषिद्ध है

पर जीवन तो कभी कह ही नहीं पाया,

कि यहाँ मृत्यु निषिद्ध है

क्योंकि 

निषिद्धता का नियम 

योद्धाओं के हिस्से नहीं वरन

शासकों के हिस्से आया|


पर यकीन  मानो,

हम सब अभ्यस्त हो रहे हैं

असमय और अकारण हो रहे युद्ध के

और हमारा अभ्यस्त होना 

इस बात का परिचायक है कि

परिवर्तन के नियम क्रम में अस्त होना निषिद्ध है

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पिता

पिता के मुस्कुराने भर से, कहाँ टालता है माँ का गुस्सा

माँ की शिकायत पत्रों की पेटी होते हैं पिता

माँ की चुप्पियों की चाबी होते है पिता

माँ जानती है कि चाबी के ना होने पर टूट जाते है ताले 

इसलिए माँ हमेशा पल्लू में बांधे रखती है 

चाबी

और संसार कहता है,

पिता

"बँधे हुए हैं माँ के पल्लू से"|


पिता के कहने भर से, कहाँ थामते हैं बच्चे हाथ

बच्चों की गहरी नींद में जागते सपने होते हैं पिता 

ऊब की परछाइयों में

हाथ थामते पिता इतना जानते हैं कि,

अवसाद कितना भी गहरा हो

उम्मीद की तरह टिमटिमाते जुगनुओं से रख देंगें, 

मुट्ठी भर रौशनी संसार की विस्तृतता को बढाते हुए

शायद इसलिए 

पिता आसमान से होते हैं |


पिता थोड़ा-थोड़ा बँट भी जाते हैं 

थोड़ा छोटे काका में, थोड़ा छोटी बुआ में

ताकि थोड़ा-थोड़ा ही सही, पर मिलता रहे 

उन्हें भी 

पिता-सा दुलार....

जाने कैसे उनके पुकारने भर से पूरी कर जाते हैं,

हज़ारों किलोमीटर की दूरियाँ घंटे मात्र में

आज भी नहीं मानते पिता

उन्हें कभी अपने बच्चों से पृथक....

ऐसा कहते रहते हैं मेरे पिता, अपने स्वर्गीय पिता से|


कम उम्र में पिता को खोने का दुख पिता ने सहा

पिता के जाने बाद वह अपनी माँ के पिता भी बन गए

बिवाई से लेकर उनकी हर दवाई का

ऊँगलियों पर हिसाब रखने वाले पिता,

जब चारों ऊंगलियों को बंद करते हुए

 सोचते हैं कि उन ऊंगलियों से बंद मुट्ठी ही

यदि मेरा भाग्य है

तो यही मेरे जीवित होने का साक्ष्य है|


पिता बनते-बनते पिता सब भूल जाते हैं

यहाँ तक वह खुद को भी भूल जाते हैं

मैं उन्हें ढूँढती हूँ

तलाशती हूँ

यहाँ वहां थोड़ा बहुत खोजती हूँ

और वह मंदिर में बैठे 'गोपाल' की तरह 

मुस्कुराते हैं,

मुझे भजन सुनाते हैं....

'ओ पालनहारे

निर्गुण और न्यारे

तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं'|

_______________________________-

हर्षिता पंचारिया


5 नवम्बर 1985 को जन्मी युवा लेखिका हर्षिता पंचारिया ने एमबीए की उपाधि प्राप्त की है| इनकी रचनाएँ ब्लॉग्स, डिजिटल माध्यमों पर तथा 
प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं|
'व्योमांजलि' नामक एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है|

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

नेहा नरुका

जेबकतरे

एक ने हमारी जेब काटी और हमने दूसरे की काट ली और दूसरे ने तीसरे की और तीसरे ने चौथे की और 

चौथे ने पाँचवे की

और इस तरह पूरी दुनिया ही जेबकतरी हो गई

अब इस जेबकतरी दुनिया में जेबकतरे अपनी-अपनी जेबें बचाए घूम रहे हैं


सब सावधान हैं पर कौन किससे सावधान है पता नहीं चल रहा 

सब अच्छे हैं पर कौन किससे अच्छा है पता नहीं चल रहा 

सब जेब काट चुके हैं

पर कौन किसकी जेब काट चुका है पता नहीं चल रहा


जेबकतरे कैंची छिपाए घूम रहे हैं

संख्या में दो हजार इक्कीस कैंचियाँ हैं

इनमें से पाँच सौ एक अंदर से ही निकली हैं

अंदर वाली कैंचियाँ भी बाहर वाली कैंचियों की तरह ही दिख रही हैं

कैंचियाँ जेब काट रही हैं

सोचो जब  कैंचियाँ इतनी हैं तो जेबें कितनी होंगी?

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डर

अक्सर आधी रात को मैं डरावने ख्वाब देखती हूँ

मैं देखती हूँ मेरी सारी पोशाकें खो गई हैं

और मैं कोने में खड़ी हूँ नंगी

मैं देखती हूँ कई निगाहों के सामने खुद को घुटते हुए!


मैं देखती हूँ मेरी गाड़ी छूट रही है

और मैं बेइन्तहा भाग रही हूँ उसके पीछे!

मैं देखती हूँ मेरी सारी किताबें 

फटी पड़ीं हैं ज़मीन पर 

और उनसे निकल कर उनके लेखक

लड़ रहे हैं, चीख रहे हैं, तड़प रहे हैं

पर उन्हें कोई देख नहीं पा रहा |


मैं देखती हूँ मेरे घर की छत, सीढ़ियाँ और मेरा कमरा

खून से लथपथ पड़ा है

मैं घबराकर बाहर आती हूँ और बाहर भी मुझे आसमान से खून रिसता हुआ दिखता है 

अक्सर आधी रात को मुझे डरावने खावाब आते हैं 

और मैं सो नहीं पाती|


मैं दिनभर खुद को सुनाती हूँ हौसले के किस्से

दिल को ख़ूबसूरती से भर देने वाला मखमली संगीत 

पर जैसे-जैसे दिन ढलता है

ये हौसले पस्त पड़ते जाते हैं

और रात बढ़ते-बढ़ते डर जमा कर लेता है क़ब्जा मेरे पूरे वजूद पर

मैं बस मर ही रही होती हूँ तभी 

मेरी खिड़की से रोशनी दस्तक देती है मेरी आँखों में

और मेरा ख्वाब टूट जाता है

अक्सर..........

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बिच्छू

(हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि 'अज्ञेय' की 'सांप' कविता से प्रेरणा लेते हुए)

तुम्हें शहर नहीं गाँव प्रिय थे

इसलिए तुम सांप नहीं,

बिच्छू बने

तुम छिपे रहे मेरे घर के कोनों में 

मारते रहे निरन्तर डंक

बने रहे सालों जीवित


तुमसे मैंने सीखा:


प्रेम जिस वक्त तुम्हारी गर्दन पकड़ने की कोशिश करे

उसे उसी वक्त औंधे मुंह पटककर, अपने पैरों से कुचल दो

जैसे कुचला जाता है बिच्छू,


अगर फिर भी प्रेम जीवित बचा रहा 

तो एक दिन वह तुम्हें डंक मार-मार कर अधमरा कर देगा|

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विविधता

तुम पीपल का पेड़ हो

और मैं आम

न तुम मुझे पीपल बनने की कहना 

न मैं तुम्हें आम


एक तरफ बाग़ में तुम खड़े होगे

और एक तरफ मैं


मेरे फल तुम्हारे पत्ते चूमा करेंगे

और तुम्हारे फल मेरे पत्तों को आलिंगन में भर लेंगे


जब बारिश आएगी

हम साथ-साथ भींगेंगे


जब पतझड़ आएगा 

हमारे पत्ते साथ-साथ झरेंगे


धूप में देंगे हम राहगीरों को छाँव

अपनी शाखाओं की ओट में छिपा लेंगे हम

प्रेम करने वाले जोड़ों की आकृतियाँ


हम साथ-साथ बूढ़े होंगे

हम अपने-अपने बीज लेकर साथ-साथ मिलेंगे मिट्टी में 


हम साथ-साथ उगेंगे फिर से

मैं बाग के इस तरफ, तुम बाग के उस तरफ

न मैं तुम्हें अपने जैसा बनाऊँगी 

न तुम मुझे अपने जैसा बनाना


अगर हम एक जैसा होना भी चाहें तो यह संभव नहीं

क्योंकि इस संसार में एक जैसा कुछ भी नहीं होता

एक माता के पेट में रहने वाले दो भ्रूण भी एक जैसे कहाँ होते हैं....


फिर हम-तुम तो दो अलग-अलग वृक्ष हैं, जो अपनी-अपनी ज़मीन में गहरे तक धँसे हैं


हम किसी बालकनी के गमले में उगाये सजावटी पौधे नहीं 

जिसे तयशुदा सूरज मिला, तयशुदा पानी मिला और नापकर हवा मिली


हम आम और पीपल हैं!

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उनके कांटे मेरे गले में फँसे हुए हैं

वे सब मेरे लिए स्वादिष्ट मगर काँटेदार मछलियों की तरह हैं 

मैंने जब-जब खाना चाहा उन्हें तब-तब कांटे मेरे गले में फंस गए

उकताकर मैंने मछलियाँ खाना छोड़ दिया

जिस भोजन को जीमने का शऊर न हो उसे छोड़ देना ही अच्छा है


अब मछलियाँ पानी में तैरती हैं

मैं उन्हें दूर से देखती हूँ

दूर खड़े होकर तैरती हुई रंग-बिरंगी मछलियाँ देखना 

मछलियाँ खाने से ज़्यादा उत्तेजक अनुभव है


जीभ का पानी चाहे कितना भी ज़्यादा हो

उसमें डूबकर अधमरे होने की मूर्खता बार-बार दोहराई नहीं जा सकती|

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नेहा नरुका

जन्म:  7 दिसंबर 1987

शिक्षा: एम.ए., नेट, पीएच.डी.

रचनाएँ: फटी हथेलियाँ
'सातवाँ युवा द्वादश', 'आजकल', 'हंस', 'वागार्थ' आदि पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित 

सम्प्रति शासकीय श्रीमंत महाराज माधवराव सिंधिया महाविद्यालय, कोलारस में सहायक प्राध्यापक, हिंदी के पद पर कार्यरत|


गुरुवार, 14 मार्च 2024

निर्मला पुतुल

 मेरे एकांत का प्रवेश द्वार 

यह कविता नहीं

मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार है


यहीं आकर सुस्ताती हूँ मैं

टिकाती हूँ यहीं अपना सिर


ज़िंदगी की भाग-दौड़ से थक-हारकर

जब लौटती हूँ यहाँ

आहिस्ता से खुलता है 

इसके भीतर एक द्वार

जिसमें धीरे से प्रवेश करती मैं

तलाशती हूँ अपना निजी एकांत


यहीं मैं वह होती हूँ 

 जिसे होने के लिए मुझे

कोई प्रयास नहीं करना पड़ता 


पूरी दुनिया से छिटककर

अपनी नाभि से जुडती हूँ यहीं!


मेरे एकांत में देवता नहीं होते

न ही उनके लिए 

कोई प्रार्थना होती है मेरे पास


दूर तक पसरी रेत 

जीवन की बाधाएँ

कुछ स्वप्न और 

प्राचीन कथाएँ होती हैं


होती है-

एक धुँधली-सी धुन

हर देश-काल में जिसे 

अपनी-अपनी तरह से पकड़ती

स्त्रियाँ बाहर आती हैं अपने आपसे 


मैं कविता नहीं

शब्दों में ख़ुद को रचते देखती हूँ

अपनी काया से बाहर खड़ी होकर 

अपना होना!

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बाहामुनी

तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हज़ारों

पर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट  


कैसी विडम्बना है कि

ज़मीन पर बैठ बुनती हो चटाईयाँ

और पंखा बनाते टपकता है 

तुम्हारे करियाये देह से टप....टप...पसीना....!


क्या तुम्हें पता है कि जब कर रही होती हो तुम दातुन 

तब कर चुके होते हैं सैकड़ों भोजन-पानी

तुम्हारे ही दातुन से मुँह-हाथ धोकर? 


जिन घरों के लिए बनाती हो झाडू

उन्हीं से आते हैं कचरे तुम्हारी बस्तियों में?


इस ऊबड़-खाबड़ धरती पर रहते 

कितनी सीधी हो बाहामुनी 

कितनी भोली हो तुम

कि जहाँ तक जाती है तुम्हारी नज़र

वहीँ तक समझती हो अपनी दुनिया 

जबकि तुम नहीं जानती कि तुम्हारी दुनिया जैसी

कई-कई दुनियाएँ शामिल है इस दुनिया में


नहीं जानती 

कि किन हाथों से गुजरती 

तुम्हारी चीजें पहुँच जाती हैं दिल्ली

जबकि तुम्हारी दुनिया से बहुत दूर है अभी दुमका भी!

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आदिवासी लड़कियों के बारे में

ऊपर से काली

भीतर से अपने चमकते दाँतों 

की तरह शान्त धवल होती हैं वे


वे जब हँसती हैं फेनिल दूध-सी 

निश्छल हँसी

तब झर-झराकर झरते हैं......

पहाड़ की कोख में मीठे पानी के सोते

 

जूड़े में खोंसकर हरी-पीली पत्तियाँ 

जब नाचती हैं कतारबद्ध

माँदल की थाप पर 

आ जाता तब असमय वसन्त


वे जब खेतों में 

फसलों को रोपती-काटती हुई

गाती हैं गीत

भूल जाती हैं ज़िन्दगी के दर्द

ऐसा कहा गया है-


किसने कहे हैं उनके परिचय में 

इतने बड़े-बड़े झूठ?

किसने ?


निश्चय ही वह हमारी जमात का

खाया-पीया आदमी होगा....

सच्चाई को धुन्ध में लपेटता 

एक निर्लज्ज सौदागर 


जरूर वह शब्दों से धोखा करता हुआ 

 कोई कवि होगा 

मस्तिष्क से अपाहिज!

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अखबार बेचती लड़की

अखबार बेचती लड़की

अखबार बेच रही है या खबर बेच रही है

यह मैं नहीं जानती

लेकिन मुझे पता है कि वह

रोटी के लिए अपनी आवाज बेच रही है


अखबार में फोटो छपा है

उस जैसी बदहाल कई लड़कियों का

जिससे कुछ-कुछ उसका चेहरा मिलता है

कभी-कभी वह तस्वीर देखती है

कभी अपने आप को देखती है

तो कभी अपने ग्राहकों को


वह नहीं जानती है कि आज के अखबार की

ताजा खबर क्या है

वह जानती है तो सिर्फ यह कि

कल एक पुलिस वाले ने

भद्दा मजाक करते हुए धमकाया था

वह इस बात से अंजान है कि वह अखबार नहीं

अपने आप को बेच रही है

क्योंकि अखबार में उस जैसी

कई लड़कियों की तस्वीर छपी है

जिससे उसका चेहरा मिलता है!

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अभी खूँटी में टाँगकर रख दो माँदल

ऐ मीता!

मत बजाओ 

जब-तब  बाँसुरी


कह दो अपने संगी-साथी से

बजाएं नहीं असमय ढ़ोल-माँदल


रसोई में भात पकाते

थिरकने लगते हैं मेरे पाँव

मन उड़ियाने लगता है 

रूई के फाहे-सा दसों दिस


अभी बहुत सारा काम पड़ा है

घर गृहस्थी का

गाय गोहाल के गोबर में फँसी है

लानी है जंगल से लकड़ियाँ भी

घड़ा लेकर जाना है पानी लाने झरने पर 

और पंहुचाना है खेत पर बापू को कलेवा 


देखो सबकुछ गड़बड़ हो जाएगा

सुननी पड़ेगी माँ से डाँट

इसलिए मेरा कहा मानो

अभी रख दो छप्पर  में खोंसकर बाँसुरी 

टाँग दो खूँटी पर माँदल  

और लाओ अपनी कला 

अँचरा में बाँधकर रख लूँ मैं 


लौटा दूँगी वापस बँधना में

तब जी भरके बजाना

मैं भी मन-भर नाचूँगी संग तुम्हारे


तब तक के लिए लाओ 

तुम्हारी कला

अँचरा में बाँधकर रख लूं मैं!

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निर्मला पुतुल 

जन्म: 6 मार्च 1972, दुमका, झारखण्ड

शिक्षा: नर्सिंग में डिप्लोमा, स्नातक(राजनीति शास्त्र)

रचनाएँ: 
हिंदी कविता संग्रह-
नगाड़े की तरह बजते शब्द, अपने घर की तलाश में, बेघर सपने, फूटेगा नया विद्रोह(शीघ्र प्रकाश्य) ; 
संथाली कविता संग्रह- ओनोंड़हें
सम्पादन: स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर के कई हिंदी-संथाली पत्र-पत्रिकाओं का संपादन तथा सह-संपादन|
सम्मान एवं पुरस्कार:
         साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा साहित्य सम्मान, झारखंड सरकार द्वारा राजकीय सम्मान, झारखंड सरकार के कला-संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत, हिंदी साहित्य परिषद, मैथन द्वारा सम्मानित, मुकुटबिहारी सरोज स्मृति सम्मान-ग्वालियर, भारत आदिवासी सम्मान, मिजोरम सरकार, विनोबा भावे सम्मान-नागरी लिपि परिषद् दिल्ली, हेराल्ड सैमसन टोपनी स्मृति सम्मान झारखड, बनारसीप्रसाद भोजपुरी सम्मान-बिहार, शिला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान, नई दिल्ली, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा समानित, हिमाचल प्रदेश हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित, राष्ट्रीय युवा पुरस्कार-भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता आदि|


सोमवार, 2 अक्टूबर 2023

रीता दास राम

संत नहीं होता ख़ुदा

संत नहीं होता ख़ुदा
बहुत अज़ीज़ भी नहीं
ना ही वह 
जिससे नहीं चलती दुनिया 
ख़ुदा ख़ुदा है 
अपनी पूरी ख़ुदाई के साथ 
ग़म नहीं उसका साथ नहीं 
अकेले ही 
जीवन की जद्दोजहद क्या कम रूमानी है 
सुना है यहीं कहीं होता है... 
पर दिखता नहीं है ख़ुदा।  

बुधवार, 23 अगस्त 2023

सरस दरबारी

एक प्रेम कविता

आज सोचा चलो एक प्रेम कविता लिखुँ
आज तक जो भी लिखा
तुम से ही जुड़ा था 
उसमें विरह था 
दूरियाँ थीं, शिकायतें थीं
इंतज़ार था, यादें थीं
लेकिन प्रेम जैसा कुछ भी नहीं
हो सकता है वे जादुई शब्द
हमने एक दूसरे से कभी कहे ही नहीं
लेकिन हर उस पल जब एक दूसरे की ज़रुरत थी
हम थे
नींद में अक्सर तुम्हारा हाथ खींचकर
सिरहाना बना आश्वस्त हो सोई हूँ
तुम्हारे घर देर से पहुँचने पर बैचैनी
और पहुँचते ही महायुद्ध!
तुम्हारे कहे बगैर 
तुम्हारी चिंताएँ टोह लेना
और तुम्हारा उन्हें यथासंभव छिपाना
हर जन्मदिन पर रजनीगंधा और एक कार्ड
जानते हो उसके बगैर
मेरा जन्मदिन अधूरा है
हम कभी हाथों में हाथ ले
चाँदनी रातों में नहीं घूमे
अलबत्ता दूर होने पर
खिड़की की झिरी से चाँद को निहारा ज़रूर है
यही सोचकर की तुम जहाँ भी हो
उसे देख मुझे याद कर रहे होगे
यही तै किया था न 
बरसों पहले
जब महीनों दूर रहने के बाद 
कुछ पलों के लिए मिला करते थे
कितना समय गुज़र गया
लेकिन आदतें आज भी नहीं बदलीं
और इन्हीं आदतों में
न जाने कब 
प्यार शुमार हो गया 
चुपके से
दबे पाँव

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फ़र्क पड़ना

तुम्हारा यह कहना की तुम्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता
इस सच को और पुष्ट कर देता है कि
तुम्हें फ़र्क पड़ता है!
दिन की पहली चाय का पहला घूँट 
तुम लो 
मेरे इस इंतज़ार से...
तुम्हें फ़र्क पड़ता है!
तुमसे अकारण ही हुई बहस से 
माथे पर उभरीं उन सिलवटों से...
तुम्हें फ़र्क पड़ता है!
मंदिर की सीढियाँ चढ़ते हुए, दाहिना पैर
साथ में चौखट पर रखना है इस बात से...
तुम्हें फ़र्क पड़ता है!
इस तरह.. रोज़मर्रा के जीवन में
घटने वाली हर छोटी बड़ी बात से तुम्हें फ़र्क पड़ता है!
फिर जीवन के अहम निर्णयों में -
कैसे मान लूँ ...
कि तुम्हें फ़र्क नहीं पड़ता...!
यह 'फ़र्क पड़ना' ही तो वह गारा मिटटी है जो
रिश्तों की हर सेंध को भर
उसे मज़बूत बनाता है
वह बेल है जो उस रिश्ते पर लिपटकर
उसे खूबसूरत बनाती है
छोटी-छोटी खुशियाँ उस पर खिलकर
उस रिश्ते को संपूर्ण बनाती हैं
और 'फ़र्क पड़ना' तो वह नींव है
जो जितनी गहरी,
उतने ही मज़बूती
और ऊँचाइयाँ पाते हैं रिश्ते...!

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यादें ...कुछ ऐसी भी

अनगिनत यादें
पोटलियों में खुर्सी हुई
आलों पर दुबकी
कुछ सीली सी
अलगनी पर टँगी
कुछ तुम्हारी दी हुई
सूखे फूलों की शक्ल में
किताबों में दबीं
कुछ इबारत बनकर
पन्नों में छपी
कुछ यादें 
आज भी झूल रहीं हैं
पालनों, झबलों,
तिकोनियों, में
कुछ अधूरे खिलौनों में
कुछ कसैली यादें
खूँटा गाढ़ बैठी हैं
मन के नम कोनों में
जहाँ खुशी की धूप
अपनत्व की ऊष्मा
नही पहुँच पाती
पलों हफ्तों महीनों सालों
के विस्तार में फैली यह यादें
बंधी हैं एक मजबूत डोर से 
जिसके दूसरे सिरे पर 
तुम हो....!

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मित्र नीम

तुम्हें कड़वा क्यों कहा जाता है 
तुम्हें तो सदा मीठी यादों से ही जुड़ा पाया 
बचपन के वे दिन जब
गर्मियों की छुट्टियों में 
कच्ची मिटटी की गोद में 
तुम्हारी ममता बरसाती छाँव में,
कभी कोयल की कुहुक से कुहुक मिला उसे चिढ़ाते 
कभी खटिया की अर्द्वाइन ढीली कर
बारी-बारी से झूला झुलाते 
और रोज़ सज़ा पाते
कच्ची अमिया की फाँकों में नमक मिर्च लगा
इंतज़ार में गिट्टे खेलते 
और रिसती खटास को चटखारे ले खाते....
भूतों की कहानियाँ 
हमेशा तुमसे जुड़ी रहतीं 
एक डर, एक कौतुहल, एक रोमांच
हमेशा तुम्हारे इर्द-गिर्द मंडराता
और हम
अँधेरे में आँखें गढ़ा
कुछ डरे... कुछ सहमे
तुम्हारे आसपास 
घुंघरुओं के स्वर और आकृतियाँ खोजते 
समय बीता -
अब नीम की ओट से चाँद को
अठखेलियाँ करता पाते
सिहरते, शर्माते -
चांदनी से बतियाते -
और कुछ जिज्ञासु अहसासों को
निम्बोरियाओं सा खिला पाते 
तुम सदैव एक अंतरंग मित्र रहे
कभी चोट और टीसों पर मरहम बन 
कभी सौंदर्य प्रसाधन का लेप बन 
तेज़ ज्वर में तुम्हें ही सिरहाने पाया 
तुम्हारे स्पर्श ने हर कष्ट दूर भगाया
यही सब सोच मन उदास हो जाता है
इतनी मिठास के बाद भी
तुम्हें क्यों कड़वा कहा जाता है...!

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कुछ क्षणिकाएँ

1.
बचपन की आदतें
कभी नहीं भूलतीं
रंग बिरंगे चश्मे आँखों पर चढ़ा
कितनी शान से घूमते थे
जिस रंग का चश्मा 
उसी रंग की दुनिया 
आज भी दुनिया को उसी तरह देखते है 
आँखों पर -
प्रेम,
द्वेष,
पक्षपात का चश्मा लगाये
और रिश्तों को उसी रंग में ढला पाते हैं ...!
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2.
बड़प्पन
बड़ा बनने के लिए
सिर्फ़ एक लकीर
खींचनी है 
दूसरे के व्यक्तित्व के आगे 
अपने व्यक्तित्व की 
एक छोटी लकीर ..!
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3. 
खुरचन 
तपती कढ़ाई के किनारों पर 
जमी खुरचन -
किसे नहीं सुहाती!
सच..!
दर्द जितना गहरा -
उतना मीठा!
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4. 
कान 
सुना था कभी 
शरीर के अनावश्यक अंग झड़ जाते हैं
जिस हिस्से की नहीं ज़रुरत 
वह छिन्न हो जाते हैं
और जो इस्तेमाल हों 
वे हृष्ट पुष्ट हो जाते हैं 
मैंने हाल ही में 
दीवारों के कान उगते देखे हैं ...!

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सरस दरबारी

जन्म - 09 सितंबर 1958। मुंबई विश्व विद्यालय से राजनितिक विज्ञान में स्नातक। कविताएँ- दोहे, हाइकु, महिया, गीत छंदमुक्त रचनाएँ, कहानियाँ, आलेख, लघु कथाएँ आदि विधाओं में लेखन।
प्रकाशित पुस्तकें - 10 साझा काव्य संग्रह व 5 साझा लघुकथा संग्रह। 
वासंती बयार- वसंत पर साझा संकलन। ब्लॉगर्स के अधूरे सपनों की कसक (साझा संस्मरण)। नारी विमर्श के अर्थ में आलेख। महिला साहित्यकारों की समस्या (अयान प्रकाशन) में आलेख। नहीं, अब और नहीं (सांप्रदायिक दंगों की कहानियों का साझा संकलन)। एकल काव्य संग्रह – मेरे हिस्से की धूप। आकाशवाणी मुंबई से 'हिंदी युववाणी' व मुंबई दूरदर्शन से 'हिंदी युवदर्शन' का संचालन। 'फिल्म्स डिविज़न ऑफ़ इंडिया' के पैनल पर 'अप्रूव्ड वॉईस'।
सम्मान - एकल काव्य संग्रह 'मेरे हिस्से की धूप' के लिए 'राधा अवधेश स्मृति पांडुलिपि सम्मान'।
डाक का पता - श्रीमती सरस दरबारी, E-104, सकन्द अपार्टमेंट, लूकरगंज, प्रयागराज 21001
ईमेल - sarasdarbari@gmail.com

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