गुरुवार, 25 जनवरी 2024

नीलेश रघुवंशी



 जंगल और जड़ 

इमारत के ऊपर इमारत

खाई के नीचे खाई

दूर-दूर तक फैला कंक्रीट का जंगल

आएगा एक दिन ऐसा आएगा

जब हमें हमारी ज़मीन मिलेगी वापस 

सीमेंट की टंकी में पानी पीती चिड़िया से

कहा पीपल की फूटती जड़ ने 

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बुआ का दुख

चाय की शौक़ीन बुआ

पी जाती जाने कितनी चाय दिन भर में 

और अब मिलती है सिर्फ़ दो चाय 

वो भी दूध कम और ज्यादा पानी वाली


धमकाता जब-तब बेटा कौन जोतेगा ज़मीन उसकी

आसन नहीं किसी दामाद-बेटी का आना घर में बिना उसकी इच्छा के -

और तू भी चली न जाना ड्योढ़ी के पार-

किसी और का अँगूठा लगवा

बुआ की साड़ी ज़मीन-जायदाद कर ली बेटे ने अपने नाम

देखती रह गई भौचक सी अँगूठे को कागज़ पर 

पटवारी ने क्या कहा?बुआ ने कितना सुना? नहीं जानता कोई

रुँधे गले से, आँख से आँसू पोंछती सुनाती बुआ

बाद भी इसके 

घर-परिवार में जन्मती है जब कभी बेटी

बूढ़ी जर्जर बुआ भर जाती है दुख से

पराया धन होती हैं बेटियाँ

माँ-बाप का नहीं, किसी और का जीवन तारती हैं


अँधेरे में रास्ता टटोलती बड़बड़ाती जाती है बुआ|

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स्त्री-विमर्श

मिल जानी चाहिए अब मुक्ति स्त्रियों को

आखिर कब तक विमर्श में रहेगी मुक्ति

बननी चाहिए एक सड़क, चलें जिस पर सिर्फ़ स्त्रियाँ ही

मेले और हाट-बाज़ार भी अलग

किताबें अलग, अलग हों गाथाएँ

इतिहास तो पक्के तौर पर अलग

खिड़कियाँ हों अलग-

झाँके कभी स्त्री तो दिखे सिर्फ़ स्त्री ही 

हो सके तो बारिश भी हो अलग


लेकिन -

परदे की ओट से झाँकती ओ स्त्री 

तुम - 

खेत-खलिहान और अटारी को सँवारो अभी

कामवाली बाई, कान मत दो बातों पर हमारी 

बुहारो ठीक से, चमकाओ बर्तन

सर पर तगाड़ी लिए दसवें माले की और जाती 

ओ कामगार स्त्री 

देखती हो कभी आसमान, कभी ज़मीन 

निपटाओ बखूबी अपने सारे कामकाज

होने दो मुक्त अभी समृद्ध संसार की औरतों को 

फिलहाल संभव नहीं मुक्ति सबकी |

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बित्ता भर जगह 

अपनी एक जवान बेटी और दो बेटों के संग छत पर 

बसाई अपनी गिरस्ती

वे छत पर नहाते, कपड़े धोते और सजाते-सँवरते हैं

जवान लड़की

जब तब ईंटों के बीच रखे आईने को निकाल निहारती है खुद को

वे सबके बाद सोते और सबसे पहले उठते 

पूरी कोशिश करते हैं पड़ोसियों की आँख से बची रहे उनकी गृहस्थी

रहते हैं इस तरह कि रहते हुए भी नहीं होते किसी के आसपास

छत पर मिली बित्ता भर जगह कहीं छूट न जाए 

इसी आशंका को अपने संग लिए......

दिन भर मालकिन की जी हुजूरी में लगी रहती है

वह साँवली और मजबूत औरत

इतनी थकी होती है वह कि ईंट पर सर रखते ही चली जाती है 

गहरी नींद में

आदमी जब तब  पीता है बीड़ी धुएँ को अपने आसपास समेटे 

छत पर रखी ईंटें 

सिरहाना भी हैं उनका और आड़ भी

बचाती हैं जो पड़ोसियों की आँख से

दूर-दूर तक फैली धरती सिकुड़-सिकुड़ जाती है

जब सारा परिवार सोता है छत पर पाँव सिकोड़कर

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जन्म: 4 अगस्त, 1969


रचनाएँ: घर निकासी, पानी का स्वाद, अंतिम पंक्ति में, 

एक कस्बे के नोट्स ,एलिस इन वंडरलैंड, डॉन क्विगजोट, झाँसी की रानी, छूटी हुई जगह, अभी ना होगा मेरा अंत, सैयद हैदर रजा एवं ब.व. कारंत

पुरस्कार और सम्मान: भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, आर्य स्मृति साहित्य सम्मान, दुष्यंत कुमार स्मृति सम्मान, केदार सम्मान, शीला स्मृति पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् का युवा लेखन पुरस्कार, स्पंदन कृति पुरस्कार, प्रेमचंद स्मृति सम्मान, शैलप्रिया स्मृति सम्मान, डी.डी. अवार्ड 2003, 2004|

सम्प्रति: दूरदर्शन केंद्र, भोपाल में कार्यरत


गुरुवार, 18 जनवरी 2024

जितेन्द्र श्रीवास्तव

 पिता होना 

पिता होना 
जिम्मेदार आदमी हो जाना है 

इस तरह जिम्मेदार हो जाना
जिसमें 'स्व' का विलय हो जाना
स्वयं सृजित संसार में
निहायत जरूरी हो जाता है

बिना किसी संकोच के 
मन की समस्त दुविधाओं को 
दूर....बहुत दूर फेंक आना
जहाँ से लौटकर उसके सपने भी न आएँ

प्रशांत पड़े जीवन में 
किसी पल अचानक पिता हो जाने का सन्देश होता है

चुपके से न जाने 
कहाँ चला जाता है किशोरावस्था में अर्जित उन्माद 
बदल जाता है चंचलता का चरित्र
कुछ भी नहीं रहता जीवन में ठीक-ठाक पहले की तरह

सिवाय अपनी आँखों में बस गई अपने पिता की 
दो चमकती आँखों के
जिसमें सपने अपने लिए नहीं 
बच्चों के लिए आते हैं 
बहुत सुखद होता है पिता हो जाना 
इस संशय का मर जाना
कि जिंदगी बंजर भी हो सकती है 

बंजर न होना पिता होना है

पिता होना सिर्फ बच्चे पैदा करना नहीं होता 
जिम्मेदारियों में स्वयं को मिटाना होता है 

स्वयं को मिटाना 
अपने सपनों में खुद अनुपस्थित हो जाना 
छोड़ देना उसमें बच्चों को 
निश्छल किलकारियाँ भरने के लिए 
पिता होना है

पिता होना ब्रह्मा होना है

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फर्क

निगाहों की अलगनी पर
टँगा है स्मृतियों का वसन
जो आज तक नहीं सूख पाया
पिछले कई वर्षों में

आज भी है उतना ही भीगा
उतना ही साफ़

कितना फर्क होता है
सूर्य धूप और प्रेम धूप में !

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बेटियाँ

यह दिसंबर की पहली तारीख को
ढल रही शाम है

धूप चुपके से ठहर गई है
नीम की पत्तियों पर

इस समय मन में उजास है
उसमें टपकता है शहद की तरह
बेटियों का स्वर

बेटियाँ होती ही शहद हैं
जो मिटा देती हैं
आत्मा की सारी कड़वाहट

अभी कुछ पल बाद धूप सरक जाएगी 
आँचल की तरह पत्तियों से
पत्तियाँ अनंत काल तक नहीं रोक सकतीं धूप को 
पर बेटियाँ नरम धूप की तरह 
बनी रहती हैं सदा 
पिता के संसार में

जितनी हँसी होती है बेटियों के अधर पर 
उतनी उजास होती है पिता के जीवन में

जो न हँसें बेटियाँ 
तो अँधेरे में खो जाते हैं पिता |

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अनभै कथा

यही है मगहर
जहाँ अंतिम साँस ली थी कबीरदास ने 

मगहर से गुजरते हुए
दीख ही जाता है
आमी नदी का मटमैला पानी

पर आज देख रहा हूँ 
ट्रेन पर सवार हो रहे 
सैकड़ों नर-नारियों को 

गजब का उत्साह है इनमें 
सबने बाँध रखीं हैं गठरियाँ 
सब जा रहे हैं बहराइच 
शामिल होने 
बाले मियाँ की बारात में

बाले मियाँ की बारात 
हर साल सजती है वहाँ 
हर साल पहुँचते हैं हजारों हिंदू-मुलसमान 

सब वहाँ जाकर मानते हैं मनौतियाँ
और उन्हें विश्वास होता है 
पूरी होगी उनकी इच्छा 
और जो न हो पूरी
तो उन्हें दाता की शक्ति पर नहीं 
अपनी इबादत पर शक होता है 

ट्रेन छूट रही है मगहर स्टेशन से
बिलकुल साफ़ दीख रहा है 
कबीर की याद में बनी मस्जिद 
दीख रहा है मंदिर 
काँप रहा है आमी का जल

और अब पीछे छूट रही है 
स्टेशन की दीवारों पर अंकित कबीर-वाणी |

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दूब

अदम्य जिजीविषा से भरी है दूब

उसे जमने और पसरने को 
नहीं चाहिए सिर्फ नदी का किनारा 
पत्थरों के बीच भी
सर उठाने की जगह  
ढूँढ लेती है दूब 

मिट्टी से कितना भी दबा दीजिए 
मौका पाते ही 
पनप उठती है वह

पसर जाती है 
सबको मुँह चिढ़ाते हुए 

जमने को अपना अधिकार मानकर 
देती आ रही है वह चुनौती 
अपने खिलाफ साजिश करने वालों को 
सृष्टि के आरंभिक दिनों से |

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जन्म : 8 अप्रैल, 1974

रचनाएँ : हिन्दी और भोजपुरी में लेखन-प्रकाशन। ‘इन दिनों हलचल’, ‘अनभै कथा’, ‘असुन्दर सुन्दर’, ‘बिलकुल तुम्हारी तरह’, ‘कायान्तरण’, ‘कवि ने कहा’ (कविता-संग्रह); 

‘भारतीय समाज, राष्ट्रवाद और प्रेमचन्द’, ‘शब्दों में समय’, ‘आलोचना का मानुष-मर्म’, ‘सर्जक का स्वप्न’, ‘विचारधारा, नए विमर्श और समकालीन कविता’, ‘उपन्यास की परिधि’, ‘रचना का जीवद्रव्य’ (आलोचना); ‘शोर के विरुद्ध सृजन’ (ममता कालिया का रचना-संसार), ‘प्रेमचन्द : स्त्री जीवन की कहानियाँ’, ‘प्रेमचन्द : दलित जीवन की कहानियाँ’, ‘प्रेमचन्द : स्त्री और दलित विषयक विचार’, ‘प्रेमचन्द : हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्बन्धी कहानियाँ और विचार’, ‘प्रेमचन्द : किसान जीवन की कहानियाँ’, ‘प्रेमचन्द : स्वाधीनता आन्दोलन की कहानियाँ’, ‘कहानियाँ रिश्तों की : परिवार’ (सम्पादन),साहित्यिक पत्रिका 'उम्मीद' का संपादन । इनके अतिरिक्त पत्र-पत्रिकाओं में दो सौ से अधिक आलेख प्रकाशित हैं।

पुरस्कार एवं सम्मान: ‘भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार’, ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ , हिन्दी अकादमी, दिल्ली का ‘कृति सम्मान’, उ.प्र. हिन्दी संस्थान का ‘रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार’, उ.प्र. हिन्दी संस्थान का ‘विजयदेव नारायण साही पुरस्कार’, भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता का ‘युवा पुरस्कार’, ‘डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान’ और ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’ |

सम्प्रति इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के मानविकी विद्यापीठ में हिन्दी के प्रोफ़ेसर तथा इग्नू के पर्यटन एवं आतिथ्य सेवा प्रबन्धन विद्यापीठ के निदेशक तथा विश्वविद्यालय के कुलसचिव।






गुरुवार, 11 जनवरी 2024

श्रीप्रकाश शुक्ल

लड़का और पत्थर 


उस लड़के ने पत्थर क्यों मारा 
जबकि यह पूरे यकीन से कह सकता हूँ 
कि वह ट्रेन के किसी आदमी को नहीं जानता था 

वह एक चरवाहा था जो पटरी के किनारे खड़ा था 
उसकी भैंसे बगल के खेत में चर रहीं थीं
और वह चुपचाप ट्रेन को आता देख रहा था

उसके देखने में जो दिख रहा था
वह वही था जो मुझे दिख रहा था 
ठीक-ठीक नहीं कह सकता  
पर अचानक ही
उसने एक पत्थर फेंक दिया

यह मुझे ही लगा मैं नहीं मानता 
क्योंकि चलाया उसने किसी और पर था
और जिस पत्थर को उसने उठाया था  
वह निश्चित ही इस सब से भारी था
जो उसकी प्रसन्नता भरी तालियों में प्रकट हो रहा था

पता नहीं क्यों आज मैं बहुत प्रसन्न था 
और खेत में पसरे गाय, बैल, भैंसों के साथ
बोझा ढोती औरतों को भी देख लेता था 
जिसमें कुछ तो बालें बीन रही थीं
और बगल से गुजराती हर ट्रेन को 
थोड़ी तिरछी नज़र से देख 
मुस्कुरा देती थीं

मैं सोचते हुए सोच रहा था
कि क्या ऐसा हर रोज सोचा जा सकता है
कि बुरे दिनों की सबसे तजा स्मृति की तरह 
माँ का चेहरा खिल उठा था

मैं आज भी सोचता हूँ
कि उस लड़के ने पत्थर क्यों मारा 
जबकि वह ट्रेन के किसी आदमी को नहीं जानता था 
और वह मुझे ही क्यों लगा
जबकि मैं ही उसके बारे में अधिक सोच रहा था
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माँ

दो पन्नों के बीच सटी
या कि सटे पन्नोंके बीच अटी
अक्सर मेरी दुनिया में माँ प्रकट होती है
और इनको चीन्हने की इच्छा से
बचपन की किसी सुनहरी गुफा में घुसता हूँ
और एक पूरा का पूरा जंगल पकड़ लाता हूँ
जो भाषा के उपटन में पड़कर 
कविता की परात में झर रहा होता है 

माघ के मौसम में 
पश्चिम झकोरों के बीच 
जब दातों से कड़िया के कूटने की आवाज़ आती है
वह पुवाल की तरह उठती है
और बोरसी की तरह छोप लेती है 

अपनी दुनिया की हर मिट्टी में 
वह बालों की तरह पकी
तथा खलिहान की तरह खाली होती है
और किसी हमीर जादूगरनी के आतंक से जूझती
सिरहाने की कजरवट में 
थोड़ा-थोड़ा रोज घिसती है 

माँ जब घिस जाती है 
मंदिर की घंटियों से घाटियों की आवाज़ आती है
और विंध्य की पठारों से उठता धुआँ
गंगा की सतह पर फ़ैल जाता है 

ठीक ऐसे समय में जब हिमालय पर गिरती है बर्फ
माँ गल रही होती है 
मेरे घर में एक मोमबत्ती जल रही होती है
और मैं बड़ा हो रहा होता हूँ|

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टोन्स


शहर में अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं
यद्यपि डाक व्यवस्था सुरक्षित है
और पूरी तरह मुस्तैद भी

चिट्ठियाँ आती नहीं
और सड़क के किनारे खड़ा डिब्बा
तो जाती भी नहीं
किसी बाँझ की तरह 
अर्ध-उन्मीलित नेत्रों से 
अपने कोख को निहारता

 लगता है शहर 
भारी सूखे के चपेट में है
और वे शब्द रहे ही नहीं
जो अपनी जड़ों में बजते 
भाषा की इच्छा से
धरती को फोड़ते रहते हैं

या कि पूरा का पूरा शहर 
किसी पुलिंदा की शक्ल में 
मोहनजोदड़ो में कैद हो गया है
जिसकी संचार व्यवस्था को ठीक करने के लिए 
किसी कुदाल की जरूरत है

शहर में अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं 
तब क्या कहा जाए
कैसे कहा जाए
कि शहर के लोग 
गोल होते जा रहे हैं
और चौराहों की संख्या में उभर रहे हैं

यदि आपको इस बात पर विशवास न हो
तो जरा किसी चौराहे पर झाँक कर देखें
होंठ और आँख की दो शिराओं पर टिका यह
अपने एकांत में 
सुबह से शाम तक 
ह्रदय के दो फेफड़ों के बीच
बजता रहता है 
जिसके बीच की दूरी का ठीक-ठाक अनुमान कठिन है 

दूरी पैसों में बदल रही है!

शहर में अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं
टोन्स आते हैं!

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तनी हुई विफलता 

अकड़ी हुई रस्सी 
बची रहती है जलने के बाद भी
राख में

वह आदमी जिसकी आँखों में चमक थी
गिरने के बाद भी छोड़ देता है कुछ रोशनी
बनिस्बत उस आदमी के जिसकी आँखें झुकी रहती हैं

अपनी लघुता में पड़ी रहकर
मुट्ठी जो तनी रहती है
ज्यादा भरोसे की होती है
उन खुली हथेलियों के 
जो चिपचिपा जाती हैं
दूसरे की महानता को ढ़ोते-ढ़ोते

आँधी में टूटकर गिरा हुआ मकान
तूफ़ान में सूखकर रेत हुई नदी
थककर गिरा हुआ आदमी
ज्यादे भरोसे का होता है 

अपनी-अपनी संभावनाओं में 
समर्पित सफलता से ज्यादा मूल्यवान होती है 
तनी हुई विफलता 

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श्रीप्रकाश शुक्ल 

जन्म : 18 मई, 1965, सोनभद्र(उ.प्र.) 
रचनाएँ: अपनी तरह के लोग, जहाँ सब शहर नहीं होता, बोली बात, 
रेत में आकृतियाँ, ओरहन और अन्य कविताएँ, वाया नई सदी,

आलोचना: साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौन्दर्य, नामवर की धरती
सम्पादन: 'परिचय' तथा 'दोस्त'

पुरस्कार: मलखान सिंह सिसोदिया पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान 
द्वारा नरेश मेहता कविता पुरस्कार तथा विजयदेव नारायण साही पुरस्कार,
सर्जना पुरस्कार 

सम्प्रति : बी.एच,यू. के हिंदी विभाग में प्रफेसर के रूप में कार्यरत:






गुरुवार, 4 जनवरी 2024

मदन कश्यप

ग़नीमत है

गनीमत है

कि पृथ्वी पर अब भी हवा है

और हवा मुफ्त है

 

ग़नीमत है

कि कहीं-कहीं लगे हैं निःशुल्क प्याऊ

और कोई-कोई पिला देता है बिना पैसा लिए पानी

 

ग़नीमत है

कि सड़कें पैदल चलने का भाड़ा नहीं माँगतीं

हालाँकि शहरी घरों में मुश्किल से आ पाती है

फिर भी धूप पर कोई टैक्स नहीं है

 

ग़नीमत है

कि कई पार्कों में आप मुफ़्त जा सकते हैं

बिना कुछ दिए समुद्र को छू सकते हैं

सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य देख सकते हैं

 

ग़नीमत है

कि ग़नीमत है !

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बचे हुए शब्द


जितने शब्द आ पाते हैं कविता में

उससे कहीं ज्यादा छूट जाते हैं

 

बचे हुए शब्द छपछप करते रहते हैं

मेरी आत्मा के निकट बह रहे पनसोते में

 

बचे हुए शब्द

थल को

जल को

हवा को

अगिन को

आकाश को

लगातार करते रहते हैं उद्वेलित

 

मैं इन्हें फाँसने की कोशिश करता हूँ

तो मुस्कुराकर कहते हैं :

तिकड़म से नहीं लिखी जाती कविता

और मुझ पर छींटे उछालकर

चले जाते हैं दूर गहरे जल में

मैं जानता हूँ इन बचे शब्दों में ही

बची रहेगी कविता !

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चूल्हे के पास

 

गीली लकड़ियों को फूँक मारती

आँसू और पसीने से लथपथ

चूल्हे के पास बैठी है औरत

हज़ारों-हज़ार बरसों से

धुएँ में डूबी हुई

चूल्हे के पास बैठी है औरत

 

जब पहली बार जली थी आग धरती पर

तभी से राख की परतों में दबाकर

आग ज़िन्दा रखे हुई है औरत ! 

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इन चुप्पियों का क्या करें

 

चीख़ और शोर के तो मायने निकाले जा सकते हैं

पर इन चुप्पियों का क्या करें

जो पलकें झुकाए, सिर लटकाए ऐसे खड़ी हैं

कि अपने चेहरे भी पढ़ने नहीं देतीं

 

अर्थ निचुड़े शब्दों के इस युग में यह बहुत आसान है

कि हम इन चुप्पियों पर एकदम चुप्पी साध लें

फिर खूब चीख़ें-चिल्लाएँ कविताएँ लिखें इनसे मुँह मोड़कर

 

हज़ारों विषय पड़े हैं कविता के लिए

इन चुप्पियों पर क्यों की जाए इतनी मगज़मारी

 

महज़ कविता लिखने के लिए कोई क्यों झेले इतना तनाव

 

अब जबकि पदों-पुरस्कारों के लिए लिखी जाती है कविता

यह चुप्पा समाज भला क्या देगा किसी कवि को

उसके पास तो बस चाहत होती है ऐसी कविताओं की

जो उसकी चुप्पियों का रहस्य खोल दे

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लड़की का घर

 

घर में पैदा होती है लड़की

और बार-बार जकड़ी जाती है

घर में ही रहने की हिदायतों से

फिर भी घर नहीं होता लड़की का कोई

बस एक सपना होता है

कि एक घर उसका भी होगा/पति का घर

 

सपना देखती है लड़की

अपने गाँव के सबसे बड़े घर से भी बड़े घर की

पास बुलाते दरवाजे

मुस्कुराती हुई खिड़कियाँ

माँ के आँचल-सी स्नेहिल दीवारें

लड़की के कोमल सपनों में होता है सपने-सा कोमल घर

 

दऊरी में महावरी पाँव रखती

जहां पहुंचती है लड़की

वहाँ घर नहीं होता

वहां होते हैं

मजबूत साँकलों वाले दरवाजे

कभी न खुलने वाली खिड़कियाँ

लोहे की तरह ठंडी दीवारें

जलता धुआंता बुझता चूल्हा

कच्ची मोरी के पास एक घिसा हुआ पत्थर

और कुछ अँधेरे कोने

जहाँ कुछ अँधेरे कोने

जहाँ बैठकर करूँ उसांसों के बीच

अपने लड़कपन के सपने उघेड़ती है लड़की

 

जितना बड़ा होता है घर

उतना ही छोटा होता है स्त्री का कोना

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मदन कश्यप 

जन्म : 29 मई, 1954, वैशाली, बिहार |

वरिष्ठ कवि और पत्रकार। 

रचनाएँ :  छ: कविता-संग्रह–’लेकिन उदास है पृथ्वी’ (1992, 2019),
‘नीम रोशनी में’ (2000), ‘दूर तक चुप्पी’ (2014, 2020),
‘अपना ही देश’, कुरुज (2016) और ‘पनसोखा है इन्द्रधनुष’ (2019)
आलेख संकलन-‘मतभेद’ (2002), ‘लहलहान लोकतंत्र’ (2006)
‘राष्ट्रवाद का संकट’ (2014) 
सम्पादित पुस्तक ‘सेतु विचार : माओ त्सेतुङ’ प्रकाशित। 
चुनी हुई कविताओं का एक संकलन 'कवि ने कहा' श्रृंखला में प्रकाशित|
वैचारिक पत्रिका 'सामयिक विमर्श' का सम्पादन|

पुरस्कार एवं सम्मान:  शमशेर सम्मान, केदार सम्मान, नागार्जुन सम्मान,बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान उल्लेखनीय। 
कुछ कविताओं का अंग्रेजी और कई अन्य भाषाओं में अनुवाद। 
हिन्दीतर भाषाओं में प्रकाशित समकालीन हिन्दी कविता के संकलनों 
और पत्रिकाओं के हिन्दी केन्द्रित अंकों में कविताएँ संकलित और प्रकाशित। 
दूरदर्शन, आकाशवाणी, साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट,
 हिन्दी अकादमी, विश्वविद्यालयों आदि के आयोजनों में व्याख्यान और काव्यपाठ। 


















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